Emotional Shayari’s

तुझे ये दोस्त अपना फिर पुराना याद आएगा
तुझे फिर ये मुहब्बत का ज़माना याद आएगा
ज़ीशान काविश



दुनिया भर की राम-कहानी किस किस ढंग से कह डाली
अपनी कहने जब बैठे तो एक एक लफ़्ज़ पिघलता था
ख़लीलुर रहमान आज़मी



हरीम-ए-नाज़ के पर्दे में जो निहाँ था कभी
उसी ने शोख़ अदाएँ दिखा के लूट लिया
अनवर ताबान



जलता नहीं हूँ आतिश-ए-रुख़सार देख कर
करता हूँ नाज़ ताक़त-ए-दीदार देख कर
शेख़ सोहैल



मुझे भी अपनी क़िस्मत पर हमेशा नाज़ रहता है
सुना है ख़्वाहिशें उनकी भी शर्मिंदा नहीं रहती
पप्पू लखनवी



वो आईना भी ख़ुद पर करता होगा बेहद नाज़
जिस पर देखा करती होगी यार वो सूरत अपनी
संदीप डबराल ‘सेंडी’



है दुआ याद मगर हर्फ़-ए-दुआ याद नहीं
मेरे नग़्मात को अंदाज़-ए-नवा याद नहीं
सागर सिद्दीकी



हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और
मिर्ज़ा ग़ालिब



उँगली हमारी तुम से न पकड़ी गई कभी
फिर भी तुम्हारे नाज़ उठाए फिरे हैं हम
शान मनराल



यार इतना नाज़ भी मत कर नए अहबाब पर
आज जिसका ख़ास है माज़ी मैं उसका ख़ास था
संदीप डबराल ‘सेंडी’



अपने दीवाने को देकर दर्द ओ ग़म
नाज़ ख़ुद पे किस क़दर करता है वो
अजीतेंद्र आज़ी तमाम



जिसका तारा था वो आँखें सो गई हैं
अब कहाँ करता है मुझ पर नाज़ कोई
आलोक श्रीवास्तव



इक ये भी तो अंदाज़-ए-इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ है
ऐ चारागरो दर्द बढ़ा क्यूँ नहीं देते
– अहमद फ़राज़


हम तिरे किरदार तेरे ढंग पे मरते हैं
हैं बहुत कमज़र्फ़ जो भी रंग पे मरते हैं
– अवतार सिंह जस्सर


मसलहत है फरेब-ए-हसीं
एक झूठी किरन की तरह
– रेख्ता पतौलवी


धौल-धप्पा उस सरापा नाज़ का शेवा नहीं
हम ही कर बैठे थे ‘ग़ालिब’ पेश-दस्ती एक दिन
– मिर्ज़ा ग़ालिब


हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है
– मिर्ज़ा ग़ालिब


नाज़-ओ-नख़रे क्या उठाए, क्या सुने उस के गिले
देखते ही देखते लड़की घमंडी हो गई
– काज़िम रिज़वी


अजब अंदाज़ से ये दिल फ़िदा है
अगर वो रूठ जाए रूठने दो
– मीम अलिफ़ शज़


हम तो तेरे चाहने वाले हुआ करते थे इक रोज़
तू हमें कैसे नज़र अंदाज़ कर सकता है सब में
– शिव


परतव से जिस के आलम-ए-इम्काँ बहार है
वो नौ-बहार-ए-नाज़ अभी रहगुज़र में है
– अली सरदार जाफ़री


वफ़ा तुम से करेंगे दुख सहेंगे नाज़ उठाएँगे
जिसे आता है दिल देना उसे हर काम आता है
– आरज़ू लखनवी


बादबाँ नाज़ से लहरा के चली बाद-ए-मुराद
कारवाँ ईद मना क़ाफ़िला-सालार आया
– जोश मलीहाबादी


नज़रंदाज़ करने का भी वो अंदाज़ अच्छा था
चलो ये भी हुनर उस नासमझ के नाम करते हैं
– रोहित कुमार राजपूत


एक तरीका एब्स बनाने का सीखो
योग करो या घुट घुट के मरना सीखो
– विजय पॉटर सिंहाड़िया


दर्द ऐसा नजरअंदाज नहीं कर सकते
जब्त ऐसा की हम आवाज नहीं कर सकते
– इस्माईल राज़


दर्द सहने का अलग अंदाज़ है
जी रहे हैं हम अदा की ज़िंदगी
– फ़रहत अब्बास शाह


अलग अंदाज़ हैं दोनों के अपनी बात कहने के
मैं उसपे शेर कहता हूं, वो ताना मार देती है
– अंकित मौर्य


कुछ बातें अलग हैं उसकी, अंदाज़ निराले हैं उसके
आंखे अजब हैं उसकी, और बाल काले हैं उसके
– बिट्टू खान


मैं ने तुम से मोहब्बत करी है सनम
नाज़ नख़रे उठाऊॅं तो क्या हर्ज है
– विजय पॉटर सिंहाड़िया


हिज्र की जो मुसीबतें अ’र्ज़ कीं उस के सामने
नाज़-ओ-अदा से मुस्कुरा कहने लगा जो हो सो हो
– शाह नियाज़ अहमद बरेलवी


कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
– जिगर मुरादाबादी


अम्न मनम ख़तर मनम ज़हर मनम शकर मनम
नफ़्अ’ मनम ज़रर मनम मन न-मनम न-मन मनम
– शाह नियाज़ अहमद बरेलवी


अदा से हाथ उठने में गुल राखी जो हिलते हैं
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं
– नज़ीर अकबराबादी


शह-ए-ख़ूबान-ए-मन रंगीं-क़बा नाज़ुक-अदा दारद
ब-हर ग़म्ज़: ब-हर इ’श्वः जहाने मुब्तला दारद
– अ’ली हुसैन अशरफ़ी


ख़ंजर कैसा फ़क़त अदा से
तड़पा तड़पा के मार डाला
– बेदम शाह वारसी


मैं न मानूँगा कि दी अग़्यार ने तर्ग़ीब-ए-क़त्ल
दुश्मनों से दोस्ती का हक़ अदा क्यूँकर हुआ
– अमीर मीनाई

सनम का नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा क्या
फ़क़ीर-ए-वारसी का मुद्दआ’ क्या
– हसन इमाम वारसी

इ’श्क़ अदा-नवाज़-ए-हुस्न हुस्न करिश्मा-साज़-ए-इ’श्क़
आज से क्या अज़ल से है हुस्न से साज़-बाज़-ए-इ’श्क़
– बेदम शाह वारसी

सँभालो तो तुम अपनी तेग़-ए-अदा को
मिरी जाँ-देही के हुनर देख लेना
– अकबर वारसी मेरठी

झूलो झूलना मुहम्मद बीबी-आमना के लाल
हुस्न है दिलकश अदा निराली
– संजर ग़ाज़ीपुरी

उफ़-रे बाद-ए-जोश-ए-जवानी आँख न उन की उठती थी
मस्ताना हर एक अदा थी हर इ’श्वा मस्ताना था
– बेदम शाह वारसी

दिलरुबाई की अदा यूँ न किसी ने पाई
मेरे सरकार से पहले मिरे सरकार के बा’द
– पुरनम इलाहाबादी

इस अदा से मैं ने देखे दाग़ अपने ख़ून के
इक तमाशा रोज़-ए-महशर उन का दामाँ हो गया
– मयकश अकबराबादी

मुज़्तर’ उस ने सवाल-ए-उल्फ़त पर
किस अदा से कहा ख़ुदा न करे
– मुज़्तर ख़ैराबादी

मिरा सज्दा-ए-मोहब्बत कभी इस तरह अदा हो
कि मिरी जबीं झुके जब न उठे तुम्हारे दर से
– जौहर वारसी

हम गुलशन-ए-फ़ितरत से जीने की अदा लेंगे
शाख़ों से लचक लेंगे काँटों से अना लेंगे
– फ़ना निज़ामी कानपुरी

वो पहली सब वफ़ाएँ क्या हुईं अब ये जफ़ा कैसी
वो पहली सब अदाएँ क्या हुईं अब ये अदा क्यूँ है
– मुज़्तर ख़ैराबादी

इ’श्क़ हर-आन नई शान-ए-नज़र रखता है
ग़मज़ा-ओ-इ’श्वा-ओ-अन्दाज़-ओ-अदा कुछ भी नहीं
– ज़हीन शाह ताजी

बट्ठ वहम ख़तरे दी अदा
डूझा नोही है हिक ख़ुदा
– ख़्वाजा ग़ुलाम फ़रीद

वो अदा-शनास-ए-ख़िज़ाँ हूँ मैं वो मिज़ाज-दान-ए-बहार हूँ
न है ए’तिबार-ए-ख़िज़ाँ मुझे न यक़ीन फ़स्ल-ए-बहार पर
– अज़ीज़ वारसी देहलवी

तिरी महफ़िल में जो आया ब-अंदाज़-ए-अ’जब आया
कोई लैला-अदा आया कोई मजनूँ-लक़ब आया
– अफ़क़र मोहानी

हर इक अदा को तिरी ला-जवाब कहते हैं
सितम को भी करम-ए-बे-हिसाब कहते हैं
– बर्क़ वारसी

वो आँखें वो ज़ुल्फ़ें वो रुख़ वो ग़म्ज़े वो नाज़-ओ-अदा
किस ने असीर-ए-दाम किया हम ख़ुद ही असीर-ए-दाम हुए
– सदिक़ देहलवी

तुम को अच्छा मुसलमाँ किया
और काफ़िर-अदा हो गए
– पुरनम इलाहाबादी

गर मिले इक बार मुझ को वो परी-वश कज-अदा
उस को ज़ाहिर कर दिखाऊँ दिल का मतलब दिल की बात
– किशन सिंह आरिफ़

हसीनों में वो गुल सब से जुदा है अपनी रंगत का
अदा का नाज़ का इश्वः का शोख़ी का शरारत का
– मोहम्मद अकबर वारसी

मिरा सर कट के मक़्तल में गिरे क़ातिल के क़दमों पर
दम-ए-आख़िर अदा यूँ सज्दा-ए-शुकराना हो जाए
– बेदम शाह वारसी

इक वो कि बे-कहे हमें देता है ने’मतें
इक हम कि हम से शुक्र अदा भी न हो सके
– वाजिद वारसी

जब तुम्हीं तुम हो हर अदा मेरी
फिर भला मुझ से कब जुदा हो तुम
– मरदान सफ़ी

ये आदाब-ए-मोहब्बत है तिरे क़दमों पे सर रख दूँ
ये तेरी इक अदा है फेर कर मुँह मुस्कुरा देना
– अब्दुल हादी काविश

ग़ज़ब है अदा चशम-ए-जादू-असर में
कि दिल पिस गया बस नज़र ही नज़र में
– राक़िम देहलवी

अदा-ओ-नाज़-ए-क़ातिल हूँ कभी अंदाज़-ए-बिस्मिल हूँ
कहीं मैं ख़ंदा-ए-गुल हूँ कहीं सोज़-ए-अ’नादिल हूँ
– कौसर ख़ैराबादी

गदाई में मिली शाही मुझे उस की इ’नायत से
भला क्यूँकर अदा हो शुक्र उस के लुत्फ़-ए-बे-हद का
– अख़्तर महमूद वारसी

इ’श्क़ से फिर ख़तरा-ए-तर्क-ए-वफ़ा होने लगा
फिर फ़रेब-ए-हुस्न सरगर्म-ए-अदा होने लगा
– हसरत मोहानी

मुझ से अदा हुआ है ‘जिगर’ जुस्तुजू का हक़
हर ज़र्रे को गवाह किए जा रहा हूँ मैं
– जिगर मुरादाबादी

कहाँ से जोगी की अदा और कहाँ आ’शिक़ की फबन
आतिश-ए-ग़म से जला जब से जलाया दिल-ओ-जान
– नज़ीर अकबराबादी

मक़ाम-ए-रहमत-ए-हक़ है तिरे दर की ज़मीं वारिस
अदा हो जाए मेरा भी कोई सज्दा यहीं वारिस
– क़ैसर शाह वारसी

हर सूरत-ए-मर्ग-ओ-ज़ीस्त अपनी है जुदा
उस लब ने जिलाया था अदा ने मारा
– अमीर मीनाई

क्या जानिए क्या हो गया अरबाब-ए-जुनूँ को
मरने की अदा याद न जीने की अदा याद
– जिगर मुरादाबादी

अदा ग़म्ज़े करिश्मे इश्वे हैं बिखरे हुए हर-सू
सफ़-ए-मक़्तल में या क़ातिल है या अंदाज़-ए-क़ातिल है
– मोहम्मद अकबर वारसी

मारा है ‘बयाँ’ को जिन ने ऐ शोख़
क्या जानिए कौन सी अदा थी
– एहसनुल्लाह ख़ाँ बयाँ

बता कर शोख़ियाँ उस को अदा की
डुबोई हम ने क़िस्मत मुद्दआ’ की
– राक़िम देहलवी

दरख़ुर्द-ए-सरज़निश नबूवद जुर्म-ए-आ’शिकाँ
शमशीर-ए-नाज़ व तेग़-ए-अदा रा निगाह-दार
– हसरत मोहानी

छुपा है मिक़्ना’ में किस अदा से
बना है पर्द:-नशीं सेहरा
– बेदम शाह वारसी

हर नाज़ तिरा ये कहता है हर एक अदा से ज़ाहिर है
कहने को तिरा आशिक़ हूँ मगर तू और नहीं मैं और नहीं
– रियाज़ ख़ैराबादी

आँसू बहा के दीदा-ए-जादू-तराज़ से
दिखला के इक अदा निगह-ए-फ़ित्ना-साज़ से
– रियाज़ ख़ैराबादी

दूर से ऐ निगह-ए-शौक़ बलाएँ ले ले
किस अदा से है नक़ाब-ए-रुख़-ए-ज़ेबा सेहरा
– रियाज़ ख़ैराबादी

दिलरुबाई का भी कुछ कुछ ढब उन्हें आने लगा
बात मतलब की इशारों में अदा करने लगे
– हसरत मोहानी

ख़्वाजा तोरी सूरत पे मैं वारी
नूरी प्रेम अदा पे मैं वारी
– संजर ग़ाज़ीपुरी

वो रहे ख़ुश हम से ‘मर्दां’ और कभी ना-ख़ुश रहे
दिल में हम को हर अदा उन की मगर भाती रही
– मरदान सफ़ी

तुझे देख ओ बुत-ए-ख़ुश-अदा फिरी आँख सारी ख़ुदाई से
वो जो याद रहती थी सूरतें उन्हें साफ़ दिल से भुला दिया
– औघट शाह वारसी

कुछ भीगी तालैं होली की कुझ नाज़ अदा के ढंग भरे
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे
– नज़ीर अकबराबादी

इ’श्क़ तेरा जो ऐ दिलरुबा हो गया
था जो क़िस्मत का लिखा अदा हो गया
– संजर ग़ाज़ीपुरी

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